- वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे – आपका दिमाग आपका सबसे अच्छा दोस्त है। अगर आप उसे कंट्रोल करते हैं। लेकिन अगर आपका दिमाग आपको कंट्रोल करता है। तो वो आपका सबसे बड़ा दुश्मन है। – डॉ संजय गुप्ता आईपीएस
- इंडस पब्लिक स्कूल दीपिका द्वारा वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर वेबीनार का आयोजन कर लॉक डाउन के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का खयाल रखने विषय पर बिखेरी गई जागरूकता
- अच्छा देखना, सुनना, बोलना, सोचना, कार्य करना इस बात पर निर्भर करता है। कि हम कैसा इनफार्मेशन लेते हैं क्योंकि जैसा इनपुट वैसा आउटपुट
- हमें अपने Senses से पॉजिटिव इनफार्मेशन ही लेना चाहिए, क्योकि जैसा हम सुनेंगे, देखेंगे, पढ़ेंगे महसूस करेंगे, सोचेंगे वैसा बनते जाएंगे
इंडस पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ संजय गुप्ता ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि विश्व मेंटल हेल्थ दिवस के अवसर पर इंडस पब्लिक स्कूल दीपिका द्वारा ऑनलाइन वेबीनार का आयोजन रखा गया जिसमें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य विषय पर विस्तृत रूप से पर चर्चा की गई जिस वेबीनार में बच्चों के साथ-साथ उनके परिजनों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर जागरूकता भी खेली गई
विश्व का सबसे छोटा परंतु सबसे शक्तिशाली ऊर्जा संसाधन मानव मन, जो कुछ भी करना होता है पहले मन मे संकल्प उत्पन्न होता है फिर आउटर वर्ल्ड में वह चीज रिफ्लेक्ट होती है मानसिक स्वास्थ्य को समझने से पहले हमें यह जानना होगा कि हमारा मन कार्य कैसे करता है। मानव मन दो भागों में बंटा होता कॉन्शियस माइंड व सबकॉन्सिस माइंड सब कॉन्शियस माइंड में वह सारे इंफर्मेशन जो हम बारम्बार देखते, सुनते, पढ़ते हैं वह रिकॉर्ड होता है व हमारे व्यवहार का हिस्सा बनता है अर्थात हमारा जो भी व्यवहार जो हम करते हैं वह हमारे सबकॉन्सिस माइंड में स्टोर इनफार्मेशन के आधार पर ही करते हैं हमारे सबकॉन्सिस माइंड में स्टोर इनफार्मेशन के आधार पर ही हम सोचते हैं फिर वह थॉट हमारे कर्म में आता है। लॉक डाउन के दौरान जबकि सम्पूर्ण लोग घरों में ही कैद हैं, कहीं बाहर बेवजह आ जा नहीं पा रहे, ऐसे में सबके मानसिक स्वास्थ्य का खयाल रखना अत्यंत ही आवस्यक है। चूंकि खाली समय मे मन मे व्यर्थ संकल्प का बोझ अत्याधिक होता है। अपने आप को क्रिएटिव चीजों में व्यस्त रखना, अपने हॉबी के चीजों में व्यस्त रखना, अत्यंत आवस्यक है। लॉक डाउन के दौरान टीवी या मोबाइल पर जबरन के टाइम स्पेंड करना, अत्याधिक इनफार्मेशन से मन को भर देना हमारे माइंड को कंफ्यूज बनाता है। लॉक डाउन के दौरान बच्चों की क्लासेस भी ऑनलाइन हुई है। जिससे बच्चों के हांथों में मज़बूरन मोबाइल सौंपा गया है। पर इस बात का विशेष ख्याल रहे कि बच्चे मोबाइल का सदुपयोग ही करें यह सुनिश्चित करते रहना चाहिए। मोबाइल का सदुपयोग किये जाने में किसी तरह की कोई मनाही नहीं ओर दुरुपयोग कि ओवर यूज़ करने से मेन्टल हेल्थ इसु पनपते जा रहे हैं। आज बच्चे मोबाइल में गेम खेलना, यू ट्यूब पर विभिन्न तरह के वीडियोज देखना, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना यह सब उपयोग करने लग जाते हैं। अगर बात करें सोशल मीडिया के विद्यार्थी जीवन पर प्रभाव की तो पहला तो सोशल मीडिया मैच्योर, बालिक होने के बाद ही उपयोग करने देना चाहिए, वहीं अगर बात करें सोशल मीडिया की वजह से होने वाले मेन्टल इसु की तो सोशल मीडिया के प्रयोग से इंटरनेट एडिक्शन, मोबाइल एडिक्शन, आंखों पर दुस्प्रभाव, कंसंट्रेशन पॉवर डिस्टर्ब होती है। पढ़ाई में मन ना लगना, टाइम कंसम्पशन, अत्याधिक व्यर्थ के इनफार्मेशन का अंबार, ना जानने वाली जानकारियां भी कम उम्र में मिल जाने से पथभ्रमित होने के आसार इत्यादि इस तरह से एक मोबाइल के जहां सदुपयोग करने से जिंदगी संवरती है। वहीं दुरपयोग करने से जिंदगी बिगड़ती है। साधन हमारी जीवन के दिनचर्या को सुलभ, सरल, सुगम्य बनाने के लिए होते हैं। पर अगर हम अपने मन को साधनों पर डिपेंडेंट बना दें या साधनों का दुरुपयोग, अत्याधिक उपयोग करेंगे तो निश्चित ही स्वास्थ्य पर दुस्प्रभाव पड़ता है। हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जैसा हम सुनेंगे, देखेंगे, पढ़ेंगे वह इनफार्मेशन हमारे सब कॉन्शियस माइंड का हिस्सा बन जाता है व बारम्बार जब हम उसकी पुनरावृत्ति करते हैं तो वह इनफार्मेशन हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। फिर वैसा ही व्यवहार बनता जाता है। इसलिय हमें विद्यार्थी जीवन मे टीवी से परहेज करना चाहिए क्योंकि समय खाने के साथ साथ अनेकों तरह के व्यर्थ इनफार्मेशन का अंबार मन मे टीवी से भी होता है। तो पहला हुआ मोबाइल दूसरा टीवी अब तीसरी चर्चा करते हैं संगत की क्योंकि जैसी संगत वैसी रंगत अगर हमारे दोस्त के संस्कार, व्यवहार, आदत सही हैं तो ही हमें उसकी संगत करनी चाहिये। अगर संस्कार, व्यवहार, वाणी, आदत अच्छी नहीं तो हमें ऐसी संगत से परहेज करना चाहिए उनसे दूरी बनाकर रखना चाहिए। क्योंकि संग का रंग भी लगता है। जैसे लोगों के संग हम समय व्यतीत करते हैं तो उनके संस्कार हममे आते जाते हैं। इसलिय हमें अच्छे लोगों की संगत करनी चाहिए। चौथा है इमोशनल फिट रहना आज लोग शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर थोड़े सजग तो हैं। वहीं मेन्टल हेल्थ को लेके उतने जगरुक्त नहीं। लोगों को मनोरोग चिकित्सक मतलब जब पागल हो जाते हैं । तो वही लोग मनोरोग चिकित्सक के पास जाते हैं। ऐसा आम नजरिया बना हुवाह समाज मे जबकि आज की जीवन शैली के लिए मनोरोग एक आम बीमारी हो चली मनोरोग केवल पागलों के डॉक्टर ही नहीं होते बल्कि आज के जीवन शैली की वजह से हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ते प्रतिकूल प्रभाव से बचने के लिये मनोरोग विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। वैसे भी कोविद 19 के पहले के सर्वे के मुताबिक हर 6 में से 1 भारतीय किसी ना किसी तरह के मनोरोग से ग्रसित है। लोगो को लक्षण की जानकारी ना होने से वह इडेंटिफाई नहीं कर पाते और कोविद 19 त्रासदी की वजह से फैले भय, अशांति के वातावरण की वजह से लोगों के मेन्टल हेल्थ पर और ही ज्यादा प्रभाव पड़ा है। तो यह ज्यादा बेहतर होगा कि लॉक डाउन के दौरान मेन्टल हेल्थ पर अत्यधिक फोकस करें, दिन रात मोबाइल में नेगेटिव इनफार्मेशन से स्वभाव में चिड़चिड़ापन, गेम खेलने से पढ़ाई में मन ना लगना, इंटरनेट एडिक्शन, मोबाइल एडिक्शन, सोशल मीडिया एडिक्शन, इमोशनल डिपेंडेंसी, व्यर्थ संकल्पों की वजह से बुरे सपने, देर रात तक मोबाइल का उपयोग करने की वजह से, टीवी देखने की वजह से कंप्यूटर का उपयोग देर रात तक करने की वजह से देर रात सोने से सुबह लेट में उठना, इस तरह से नींद में निरंतर व्याधि डालते रहने से नींद की बीमारी हो जाती है। जो विभिन्न तरह के मेन्टल हेल्थ इसु को बढ़ावा देती है। इसलिय अपने बच्चों को भी व स्वयं को भी इस तरह के प्रॉब्लम होने से बचने के लिये आगे सावधानियां बरतनी चाहिए
आगे डॉक्टर गुप्ता ने बतलाया कि विद्यार्थियों तथा उनके परिजनों को संबोधित करते हुवे उन्हें बतलाया गया कि मेन्टल हेल्थ के लिए आगे बताई गईं बातों के प्रति जागरूक होना अत्यंत आवस्यक है।
- समय पर सोना, समय पर उठना व्यस्त दिनचर्या की वजह से आज लोग लेट नाईट सोने लगे हैं। वहीं लेट से उठने भी लगे हैं जिससे विभिन्न तरह के मेन्टल हेल्थ इसुज भी नजर आने लगे हैं। भावनात्मक रूप से कमजोर होना इसमें से एक हैं। बच्चा कक्षा में प्रथम, द्वितीय या तृतीय आये इससे उतना फर्क उसकी आगे की रियल जिंदगी में नहीं लड़ेगा जितना फर्क बच्चे के इमोशनली वीक होने से पड़ेगा क्योकि भावनात्मक रूप से कमजोर बच्चा जीवन के उतार चढ़ाव में अपने आप को एडजस्ट नहीं कर पाता नतीजतन छोटी छोटी बातों नाराज होना, चिड़चिड़ापन, हार मान जाना, आत्मविश्वास की कमी, डरपोक बनता जाता है वहीं जो बच्चा सुबह जल्दी उठकर शारीरिक व्यायाम अर्थात फिटनेस हेतु एक्सरसाइज व मानसिक व्यायाम, योगा-मेडिटेशन इत्यादि करता है वह एमोशनली फिट रहता है। मानसिक रूप से शशक्त रहता है। जिस तरह चन्चल मन, व जो मन अस्थिर हों उस मन को सही गलत का निर्णय करने में कंफ्यूशन होता है वहीं जो मन पीसफुल हो उस मन को हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन सूझता है। तो स्थिर मन के लिये मैडिटेशन, योगा इत्यादि कारगर साबित होते हैं
- मॉर्निंग वॉक, योगा, मैडिटेशन, एक्सरसाइज इत्यादि को जीवन शैली में शामिल करना। तन स्वस्थ्य तो मन स्वस्थ्य, मन स्वस्थ्य तो तन स्वस्थ्य क्योकि दोनों की स्वस्थ्यता आपस मे एकदूसरे को स्वस्थ्य रखती है। शारीरिक स्वस्थ्यता के लिए एक्सरसाइज, मानसिक स्वस्थ्यता के लिये मैडिटेशन
- मोबाइल,लैपटॉप, टीवी, कंप्यूटर इत्यादि साधनों का केवल सदुपयोग करना चाहिए, उल्लेखित साधनों के दुरुपयोग या ओवर यूज़ से परहेज करना डिजिटल कंटेंट की अधिकता हमारे माइंड को कंफ्यूज बनाती है। इससे एकाग्रता की शक्ति कम होती है। मेमोरी पावर घटने की वजह व्यर्थ संकल्प होते हैं। व व्यर्थ संकल्पों का आधार लिए जाने वाले इनफार्मेशन होते हैं। जो आज के समय मे मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, लैपटॉप इत्यादि से आते हैं
- समय पर खाना खाना, समय पर पढ़ना व समय पर खेलना अगर सम्भव हो तो अपने सुबह से लेकर रात तक के प्रतिदिन के एक चार्ट रखें, समयशारणी अनुसार अपनी दिनचर्या फिक्स रखें। खाना चबाचबाकर खाना चाहिए, खाना खाते वक़्त बातें नहीं करनी चाहिए
- खाली समय का उपयोग अपने हॉबी में या दिलचस्पी के क्रिएटिव कार्यों में करें, जैसे लेखन, बोलने की कला निखारने के लिये, पेंटिंग, सिंगिंग, डांसिंग, म्यूजिक इत्यादि, खाली समय मे व्यर्थ संकल्प अत्याधिक चलते हैं। नेगेटिव थॉट्स के अत्याधिक होने की वजह से मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है।
- कॉम्परिशन व कॉम्पिटिशन की भावना मन मे ना पनपने दे, अपने बच्चों को दूसरे बच्चों से तुलना नाकरें, ऐसा करने से आपका बच्चा डेमोटिवेट होता है। उसे हर बात में मोटीवेट करें तब वह आगे बढ़ने की सोचेगा। अगर कॉम्पीटिशन करवाना ही है। तो बच्चों को अपने आप से करना सिखलाये इससे बच्चों के मन में पॉजिटिविटी का संचार होगा कुछ कर दिखलाने का जज्बा पनपेगा
- कॉनसन्ट्रेशन के लिये मन की एकाग्रता के लिए जरूरी है कि हम जो इनफार्मेशन ले रहे हैं। उसका खयाल रखें कि वह इनफार्मेशन हमारे लक्ष्य को लेकर क्या सही व जरूरी है क्या मेरी उम्र के लिये वह इंफोरनाशन जरूरी है चूंकि व्यर्थ के इंफर्मेशन की बोझ से हमारा मन कंफ्यूज सा बना रहता है व व्यर्थ के इंफर्मेशन का सौर्स है। टीवी मोबाइल इत्यादि हमें व्यर्थ के इनफार्मेशन से परहेज करना चाहिए। कार्टून नहीं देखना चाहिए वीडियो गेम नहीं खेलने चाहिए अगर कार्टून से जीवन जीने हेतु कोई सकारात्मक सार मिलता हो तो ही कहानी के तौर पर देख सकते हैं। पर व्यर्थ के कार्टून देखकर अपनी विद्यार्थी जीवन के कीमती समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए, एक समय मे एक ही कार्य पूरे एकाग्रता से करना चाहिए अगर खेले तो पूरे एकाग्रता से, पढ़े तो पूरी एकाग्रता से कोई भी काम करें तो पूरी तन्मयता से पूरे एकाग्रता से करना चाहिए
- संग का रंग– हमे केवल अच्छे लोगों की संगत करनी चाहिए जिनसे पॉजिटिव इनफार्मेशन शेयर किया जा सकें नेगेटिव आदतों से ग्रसित लोगो की संगत नहीं करनी चाहिए
- छोटी छोटी गतिविधियों को स्वयं पूरा कर अपने आप को आत्मनिर्भर बनाना चाहिए आत्मनिर्भर का अर्थ केवल नॉकरी करना नहीं होता वुद्यार्थी जीवन मे भी अतमिनिर्भरता की बहोत अधिक महत्ता है। अपने स्कूल ड्रेस स्वयं आयरन करना, छोटे बच्चे को स्वयं ड्रेस पहनना, जूते पहनना, होम वर्क स्वयं करना। इत्यादि यह छोटी छोटी गतिविधियां बच्चों के दूसरे पर अपने कार्यों को अंजाम देने के लिये डिपेंडेंट रहने की आदत खत्म करती है हमें बच्चों को ऐसी एक्टिविटी करवाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। ताकि आगे चलकर वह रियल जिंदगी मे भी आत्मनिर्भर बनें, किसी पर डिपेंडेंट ना बनें
- पेरेंट्स व बच्चों के बीच दोस्ताना सम्बन्ध रखें अक्सर देखा गया कि बहोत से घरों में माता पिता दोनों जॉब पर जाते हैं। ऐसे में बच्चे का लालन पालन प्रभावित होता है। बच्चा अपने मन की बात किसीसे शेयर ना कर पाने की वजह से अंदर ही अंदर घूंट घूंट कर जीता रहता है। इसके लिए अत्यंत ही आवस्यक है कि अपने बच्चे के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें जिससे कि वह खुलकर अलनी दिल की बात आपसे कह सकें व उसका मन हल्का रह सके, मन की बातें शेयर ना करने से चेहरे पर मायूसी छा जाती है, फिर पढ़ाई में भी मन नहीं लगता ऐसे में जो भी रास्ता उसके मन को समय व्यतीत करने के लिये सहीं लगता है वह उस ओर आकर्षित होता जाता है। फिर वह इंटरनेट एडिक्शन हो या व्यसन या कोई भी गलत मार्ग भी हो सकता है। तो अगर हम अपने बच्चों से दोस्त की तरह बर्ताव करेंगे तो वह हमसे हर बातें सांझा कर पायेगा व कोई भी कार्य करने से पहले एक मर्तबा हमसे पूछेगा तब ही हम सही गलत की पहचान उसे करवाकर जीवन जीने की शैली सिखलाने में सहभागिता निभा पाएंगे, आजकल के बच्चे पोजिटिवे इनफार्मेशन की तरफ कम नेगेटिव इनफार्मेशन के तरफ अधिक आकर्षित होते हैं इसलिय समय के अनुसार अब हमें एक कड़क परिजन की जगह अपने आप को एक दोस्त की तरह बनाकर बच्चों से व्यवहार करना चाहिए
- अक्सर प्रत्येक लोग अलग अलग राज्यो से बिलोंग करते हैं। जबकि अलग भाषा है अलग संस्कृति है तो सम्बन्धित संस्कृति से बच्चों को रूबरू करवाना परिजन का कार्य है। स्कूल किताबी ज्ञान के लिये है पर व्यवहारिक, सांसारिक, सांस्कृतिक ज्ञान परिवार वालों को भी बच्चों को देते रहना चाहिये। प्रत्येक रिस्ते के महत्व को समझकर अनुकूल व्यवहार करने योग्य बनाना चाहिए। समय के साथ रिस्तों की अहमियत बच्चे भूलते जा रहे हैं। वहीं कई मर्तबा इस तरह से व्यवहार कर बैठते हैं। जो बड़ो को अटपटा लगता है। तो व्यवहारिक ज्ञान भी देते रहना चाहिए निश्चित ही इंडस पब्लिक स्कूल बच्चों के सर्वांगीण विकास पर फ़ोकस करता है। पर फिर भी कुछ चीजे हैं जो घर के परिजन ही सिखला सकते हैं। जैसे उनके सम्बन्धित राज्यो से जुड़ी सभ्यता-संस्कृति, उनकी मात्रभाषा इत्यादि
- गुणग्राही हमें अपने आप को गुणग्राही बनाना चाहिए, दूसरों की कमियां नहीं देखनी चाहिए, सबकी विशेषता देखने की आदत डालनी चाहिए, क्योकि विशेषता देखते हुवे एक दिन हम खुद भी विशेष बन जाते हैं। और अगर हम दूसरों की कमी कमजोरी को देखते रहेंगे तो हममे भी वह कमी कमजोरी मन मे घर जाएगी फिर हम बहु वैसा बन जाएंगे क्योकि जिस चीज को हम बारम्बार दोहराते हैम। हमारा सब कॉन्शियस माइंड उसे रिकॉर्ड करके हमारे चरित्र का व्यक्तित्व का हिस्सा बना देता है वह चीज ऑटोमैटिक हो जाती है फिर हम वैसा ही व्यवहार ना चाहते हुवे भी करने लगते हैं