- हैप्पी नवरात्रि – इंडस पब्लिक स्कूल दीपिका द्वारा नवरात्रि के उपलक्ष्य पर बच्चों द्वारा दैवीय संस्कारों, गुणों को प्रत्यक्ष करने हेतु प्रतीक स्वरूप दैवीय श्रृंगार कर दर्शनमूर्त भाव प्रस्तुत किया गया
- हैप्पी नवरात्रि – जागरण आत्मा की अष्ठ शक्तियों का करें, दिव्य दैवीय गुणों को जीवन मे धारण करें मन्सा, वाचा, कर्मणा से सर्वश्रेष्ठ कर्म करें यही जीवन मे दैवीय गुणों का आव्हान है। – डॉ संजय गुप्ता आईपीएस दीपका
इंडस पब्लिक स्कूल में ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन कर सभी बच्चों को तथा उनके परिवार के सदस्यों को नवरात्रि की शुभकानाएं प्रेसित की गई। इस दौरान इंडस पब्लिक स्कूल के प्राचार्य से हुई परिचर्चा में उन्होंने बतलाया कि नवरात्रि के मद्देनजर आज आई.पी.एस. द्वारा ऑनलाइन वेबिनार के माध्यम से विद्यालय के बच्चों को जोड़कर साथ ही उनके परिजनों को भी नवरात्रि की बधाइयां व शुभकामनाएं प्रेसित की गई इस अवसर पर बच्चों में भारतीय संस्कार व संस्कृति प्रवाहित करने के उद्देश्य से बच्चों को दैवीय गुणों को प्रत्यक्ष करने हेतु दिव्य गुणों के प्रतीक स्वरूप दैवीय श्रृंगार कर ऑनलाइन मीटिंग में आने को कहा गया था। लॉक डाउन की वजह से प्रत्यक्ष रूप से एक्टिविटी करवा पाना तो संभव नहीं था। पर ऑनलाइन माध्यम से यह सम्भव हो पाया, भले ही बच्चे अपने अपने घरों में हैं। पर ऑनलाइन से सब आपस में जुड़कर इस गतिविधि को अंजाम दिए। इस उपलक्ष्य पर बच्चों को बतलाया कि भारतीय संस्कृति में देवी देवताओं के गुणों का अपने जीवन मे आव्हान करने की रीति चली आई है। नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य भी है। इस नवरात्रि हम सिर्फ देवियों का आव्हान नहीं करेंगे बल्कि अपने अंदर के दैवीय गुणों को जागृत कर शक्तियों का जीवन मे आव्हान कर उसे प्रैक्टिकल जीवन में एप्लीकेशन भी करेंगे। हमें अपने आंतरिक एक एक शक्तियों को समझना है। और अष्ठ शक्तियों से अपने जीवन के दस कमी कमजोरियों, बुराइयों, नेगेटिविटी रूपी रावण को खत्म करना है। वह अष्ठ शक्तियां जिनका जीवन में आव्हान करना होता है वह अष्ठ शक्तियां है। 1} अंतर्मुखता की शक्ति (power to withdraw) 2} समेटने की शक्ति (power to let go) 3} सहन करने की शक्ति (power to tolerate) 4} समाने की शक्ति (power to accept) 5} परखने की शक्ति (power to discern) 6} निर्णय करने की शक्ति (power to decide) 7} सामना करने की शक्ति (power to face) 8} सहयोग करने की शक्ति (power to cooperate)
नवरात्रि में हम देखते हैं। कि देवी दुर्गा जिनके अष्ठ हाथ वाली मूर्तियों के आगे लोग झुककर उन शक्तियों को नमन करते हैं। तो हमें अपने जीवन मे परमसत्ता, परमात्मा से राजयोगा मैडिटेशन के माध्यम से जुड़कर अपने अंदर की अष्ठ शक्तियों का जागरण कर उन शक्तियों को प्रैक्टिकल लाइफ में एप्लीकेशन करना है। तब हमारे व्यवहार पॉजिटिव होंगे। हम देखते हैं। जिस तरह देवी दुर्गा की मूरत में देवी दुर्गा असुरों पर संहार करती हुई नजर आती है। तो हमें अपने जीवन मे अपने अंदर के नेगेटिविटी, आसुरी, वृत्ति, आसुरी संस्कार, बेड हैबिट का संहार करना है। देवियों की मूरत जिस तरह हर्षित मूरत दिखलाई जाती है। हमे भी प्रैक्टिकल लाइफ में हर्षितमुखता का गुण धारण करना चाहिए। जिस तरह देवी दुर्गा के चेहरे के हाव भाव व आंखों से प्रत्यक्ष होता है। कि उनका टारगेट दुस्टों का संहार कर लोगों की रक्षा करना है। ठीक उसी प्रकार हमें अपने अंदर के नेगेटिव हैबिट पर विजय पानी है। जिस तरह देवी दुर्गा के एक हांथों में गदा दिखलाया जाता है। गदा अर्थात प्रकृति जीत, प्रकृति के पंच तत्वों से बने साधनों के अधीन नहीं होना बल्कि प्रकृतिजीत बनना है। साधनों के बिना भी जीवन बदस्तूर जी सकें कोई चीज हमारे पास है। तो अच्छा अगर नहीं है। तो उसके लिये अफसोस नहीं करना। साधनों पर डिपेंडेंट नहीं बनना। फ़िर मां दुर्गा के एक हाँथ में तलवार दिखलाई जाती है। तो हमें अपने जीवन मे ज्ञान की तलवार से हर परिस्थितियों का सामना करना है। जो कुछ भी है वह ज्ञान से ही है। ज्ञान की कमी की वजह से कोई समस्या बड़ी लगती है। वहीं जब ज्ञान हो जाता है। अनुभव हो जाता है। तो वहीं समस्या, समस्या ना होकर आम बात लगती है। देवी दुर्गा को शेर पर सवारी दिखलाई जाती है। शेर यहां प्रतीक है। कर्मेन्द्रियों का सेंस ऑर्गन का हमें अपने पंच कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी है। मन बुद्धि संस्कार को नियंत्रित रखना है। बैलेंस रखना है। वहीं आंखों से ना बुरा देखना है। ना ही कानों से बुरा सुनना है। ना ही मुख से बुरे, या कटु वचन बोलने हैं। और नाही हांथों से बुरे कर्म करने हैं। हमें सदा पॉजिटिव सोचना, देखना, सुनना, बोलना, व करना चाहिए क्योंकि हम जो कुछ भी इन पंच कर्मेन्द्रियों द्वारा देखते सुनते बोलते करते हैं वह अनुभव बनकर हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। फिर हमारा व्यवहार वैसा हो जाता है। इसलिय अगर दिव्य दैवीय गुणों को अपने में धारण करना ही है। तो हमें इनपुट्स पर गौर करना होगा कि हम जो कुछ भी कंटेंट कॉन्सुम करें वह सात्विक हो। सकारात्मक हो। उसके पश्चात हम गौर फरमाते हैं कि देवियों को किस तरह भोग लगते हैं। तो पाएंगे कि केवल वेजिटेरिअन, सात्विक अन्न का भोग ही देवियों को लगता है। क्योकि सात्विक अन्न से मन व बुद्धि पॉजिटिव डायरेक्शन में काम करने लगते हैं। कहावत भी है कि जैसा अन्न वैसा मन जैसी पानी वैसी वाणी तो विद्यार्थी जीवन मे हमें भी सादा, साधारण, वेजिटेरिअन, सात्विक अन्न को प्राथमिकता देनी चाहिए। फिर हम देखते हैं। देवियों के मूरत में एक हाँथ आशीर्वाद देते हुवे रहते हैं। जिसका आध्यात्मिक रहस्य है देने का गुण, हमें अपने जीवन में सदा लोगों को सुख, सम्मान, स्नेह, ज्ञान, सहयोग देने की कला धारण करनी चाहिए। अक्सर लोगों को बस मांगना ही आता है। जो नेगेटिव संस्कार हैं। हमें देने की कला सीखनी चाहिए व इस गुण को अपने जीवन मे धारण करना चाहिए। क्योंकि जो डाटा है। यह कायनात उसे खुद भरपूर करते जाती है। जिससे कि वह पॉजिटिव कर्म कर लोगों को देता रहे। देने का तात्पर्य यहां स्थूल धन दान से नहीं बल्कि आपके अंदर जो सुख के भाव है, शांति, स्नेह, सहयोग के भाव है वह लोगों को देना ताकि उनकी आत्मा तृप्त हो सके। इसलिय 9 दिन देवियों के आगे दिया जलाते हैं। तो दिया अर्थात नीचे के मिठ्ठी का पात्र शरीर का सिंबल है व बाती जलती हुईं आत्मा रूपी ज्योत का प्रतीक है। हमें ज्ञान से आत्मा की ज्योत जगानी है। व फिर जग को ज्ञान से प्रकाशित करना है। फिर गौर फरमाते हैं व्रत पर 9 दिन लोग व्रत रखते हैं। तो हम विद्यार्थी को इससे यह सीखना है कि हमें अपने नेगेटिव हैबिट, नेगेटिव व्यवहार, नेगेटिव एमोशन्स का व्रत रखना है। अगर हमारे अंदर बेवजह का ज्यादा बोलने, ज्यादा खाने, बाहर का खाने, बात ना मानने, टीवी देखने, मोबाइल पर अत्याधिक समय व्यतीत करने साधनों का दुरुपयोग करने, पैसे का दुरुपयोग करने के नेगेटिव संस्कार हैं। तो हमें इन कमी कमजोरियों से व्रत करना चाहिए। जिससे कि जब हमारे अंदर के अवगुण हमसे दूर होंगे तो निश्चित ही हमारा व्यावहार सकारात्मक होगा। जिसे लोगों के साथ तालमेल अच्छे होंगे, सम्बन्ध अच्छे होंगे व हम एक दूसरे से एडजस्ट करते हुवे, सहयोग करते हुवे नेचुरल वे पर जीवन जिएंगे जिसे ही संस्कारों का रास कहते हैं। जैसा कि देखते हैं ना नवरात्रि में रास अर्थात गरबा नृत्य किया जाता है। जिसमे दो डंडे हाँथ में लेकर एक दूसरे के डंडे पर डंडा देते हुवे गरबा किया जाता है। तो हमें संस्कारों का गरबा है। अर्थात जब कोई अपने संस्कारों को रिफ्लेक्ट करते हुवे हमसे कैसे भी व्यवहार करे तो हमें अपने संस्कारों से उस बात का रिएक्शन देना है। नाकि उनके संस्कारों को देखकर उन जैसा व्यवहार करना है। इससे रिस्ते मधुर जीवन खुशहाल बनता है।
आगे इंडस पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ संजय गुप्ता ने बताया कि विद्यार्थियों को डायरेक्शन दिया गया था कि वह देवी दुर्गा स्वरूप श्रृंगार कर अपने तस्वीरें व वीडियो साझा करें तो बच्चों ने डायरेक्शन को फॉलो करते हुए देवी दुर्गा की तरह श्रृंगार कर उनके गुणों को प्रत्यक्ष करने की कोशिश की ज्ञात हो कि इंडस पब्लिक स्कूल दीपका द्वारा बच्चों के सर्वांगीण विकास की ओर फोकस किया जाता रहा है। वहीं बच्चों का आध्यात्मिक विकास भी उसका ही हिस्सा है। भारतीय संस्कृति व सभ्यता में अध्यात्म का अहम योगदाम रहा है। अध्यात्म माना स्वयं को जानना की हम यह शरीर नहीं बल्कि इस शरीर को संचालित करने वाली चैतन्य शक्ति ज्योति बिंदु आत्मा हैं। जिस आत्मा के सात गुण ज्ञान प्रेम, पवित्रता, सुख, आनंद, शांति, व शक्ति होते हैं वहीं अष्ठ शक्तियां भी होती हैं। जिसे पहले ही बतलाया गया है। परिवर्तन की शुरुवात स्वयं से होती है। व स्वयं में परिवर्तन का मार्ग अध्यात्म है। भारत के प्रत्येज फेस्टिवल के पीछे एक अध्यात्मिम रहस्य छुपा हुआ है। उन रहस्यों को जानकर। उन्हें जीवन मे धारण कर हम मन्सा वच्चा कर्मणा से पॉजिटिव बन सकारात्मक कर्म करते हुवे श्रेष्ठ जीवन जी सकते हैं। उसी में से एक है। नवरात्रि। दरलसल बच्चों को भारतीय संस्कृति व सभ्यता से ओतप्रोत कर उनके मानवीय गुण को जागृत कर प्रत्यक्ष करना भी जरूरी है। किताबी ज्ञान के साथ साथ व्यवहारिक ज्ञान व मानवीय मूल्यों को जीवन मे धारण कर विचार वाणी कर्म से श्रेष्ठ बनाना हम आईपीएस का लक्ष्य रहा है व सदा रहेगा।